प्रकृति की कथा यानि कथा की प्रकृति
प्रकृति की कथा यानि कथा की प्रकृति रामनाथ शिवेंद्र कहानियों के बारे में बातंे होते ही अतीत की रहस्यमयी परतें खुलने लगती हैं, लगता है कि कहानी कहन का चलन बहुत पुराना है जो भले ही पहले की तरह नहीं पर आज तक चल रहा है। अतीत की परतें खुलते ही अतीत ही नहीं हमारा वर्तमान भी कलैया खाने लगता है, फिर तो अतीत और वर्तमान के बीच अपने पुरखों को लटकता हुआ देख कर मन बेचैन हो जाता है। कभी दादी की याद आती है तो कभी नानी की, पर दादा तथा नाना याद आते ही नही, याद आती हैं नानी और दादी। लगता है कि अतीत या वर्तमान की मानव सभ्यता में कहानियों से जितना मधुर रिश्ता नानी और दादी के रूप में नारियों का रहा है उतना नर रूपी जीव नाना और दादा का नहीं। कहानी कहन के मामलों में चाहे वह अतीत हो या वर्तमान नर विलुप्त दिखता है। कहानियों के प्रतिनिधि के रूप में नानी तथा तथा दादी का ही दिखना तथा उनमें से...